Sunday, November 26, 2017

ज़िन्दगी का दायरा
कैसे फैलता चला जाता है
एक सर्किल का लगातार
बढ़ता हुआ जैसे
सरकमफेरेंस हो !

और इंसान मानो उस
इमेजिनरी लाइन के
ऊपर खड़ा
अपने सेंटर से कितना दूर
होता चला जाता है !

उसकी जिम्मेदारियाँ
उस सर्किल की रेडियस हैं
या फिर उसकी ख्वाहिशें ! 
मिल गयी हसरतों की दुनिया ?
स्वप्न क्या साकार हुए ?
ख़यालों में था जैसा पाया
हासिल भी उसी प्रकार हुए ?

क्या हुआ भी कुछ या निरा भ्रम था ?
व्यर्थ मेरा कि सारा श्रम था ?
ख़्वाब में तो था मेरे आसमां
यथार्थ पतन का पूरा क्रम था

न चलूँ अकेला कर्म-पथ पर
क्या ऐसा है मुमकिन नहीं ?
सरल जीवन, इच्छाएं कम हों
बोझ मन पर अनगिन नहीं

क्यों दौड़ रहा हूँ हांफ-हांफ कर ?
किसके लिए मैं जीता हूँ ?
न उन्हें ही मधु मैं पिला सका
औ' खुद भी विष ही पीता हूँ 
अपनी-अपनी कहिये सनम
अपनी-अपनी करिये सनम
हज़ार राहें जहाँ में हैं
अपनी-अपनी चलिए सनम

अनसुने अनजाने यहाँ
हैं कितने अफ़साने यहाँ
किसका फ़साना कौन सुने
खुद कहिये ख़ुद सुनिए सनम

दर्द लबों पर आ न जाए
अश्क़ पलक से छलक न जाए
सबके अपने दर्द यहाँ
दिल की दिल में रखिये सनम

सुख कौन किसे दे देता है
दुःख किसका कोई ले लेता है
ये कथनी मन हल्काने के
सब अपनी करनी भरिये सनम

Monday, March 20, 2017

मेरे नाम के हिस्से में
             एक शाम सुहानी लिख देना
नाम मेरा कोई पूछे तो
             बस तेरी दीवानी लिख देना

याद मेरी जो आये तो
             अश्क़ों को हर्फ़ बना लेना
शब् की स्याह शफहों पर तुम
             दिल की कहानी लिख देना

याद है तुमको वो पल क्या
              जब तुम जाने वाले थे
आँखों से तूने जो पोछा था
              उसको न पानी लिख देना

बरस रहे थे हम तुम दोनों
              भींग रहे थे हम तुम दोनों
खामोशी में जो जन्मी थी वो
               नज़म पुरानी लिख देना

गीत जो हमने गाये थे
              कसमें जो हमने खायी थीं
मैं उनमे जीने मरने लगी
              इसे बस नादानी लिख देना

Saturday, March 18, 2017

मेरी ज़िन्दगी के तमाम ग़मों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका

न धूप भरी ज़मीं
न सूरज भरा आसमां
न सुकूँ के दिन-रात
न तेरी चाहतों का जहां
तू चली तो मेरे संग हमसफ़र
मगर उन राहों की मुश्किलो के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका

मैं तो उड़ता रहा हूँ बस
अपने ख़्वाबों की खातिर
तेरे भी तो ख्वाब होंगे
कैसे भूल गया मैं आखिर
तुमने तो ऊँची परवाज़ दी मुझे
पर बाँधने वाले कुछ रिश्तों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका

खुद रही है तू क़ैद में एक
और मुझे आज़ाद किया है
सब कुछ अपना छोड़ कर
मेरा जहां आबाद किया है
तूने क्या माँगा था मैं सोचता रहा
मगर मेरे हज़ार झूठे वादों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मेरी ज़िन्दगी के तमाम ग़मों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका



Saturday, March 11, 2017

प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !

जीवन-दुःख के बोझ तले
कन्धा जब झुक जाता है
अंतर की घोर तपिश में 
हृदय पुष्प मुरझाता है 
ऐसे में लगाए हृदय से कोई तो अश्रुधार बंध जाता है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !

बूंद-बूंद को तरसे जब मन 
पतझड़ हो जाए जीवन 
आशाओं के मेघ छटें 
धू-धू हो सपनों का वन 
आये कहीं से स्नेह के छीटें तो सावन फिर आ जाता है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !

नित दिन एक नया समंदर 
प्रस्तुत होता मंथन को 
कर्त्तव्यों के बड़े पर्वत 
सम्मुख हों आरोहण को 
अपनों का ही प्यार उसे तब संघर्ष-शक्ति दे पाता है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !

आत्म-विश्वास क्षत-विक्षत 
जग-दुत्कारों से मन आहत 
असफलता की सरिता में 
बह-बह कर अविरत 
किये वादों का स्मरण ही तब नव-विश्वास जगाता है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !




Tuesday, October 20, 2015

फ़िक्र-ए-दुनिया ने कभी बेफ़िक्र होकर रहने न दिया
खुलकर उड़ने न दिया, पिघलकर बहने न दिया

तेरी जुल्फ़ों के साये में ज़िन्दगी मेरी यूँ बीत ही जाती
मेरी बेताबी ने मगर एक जगह मुझे ठहरने न दिया

जुनूँ  ही था जो मारा-मारा फिरता रहा दर-ब-दर
घर की चिंताओं ने चैन से घर पर रहने न दिया

आऊँगा एक दिन लौट, माँ से था ये वादा मेरा
शहर की रौशनी ने मगर मुझे गांव का रहने न दिया

जिस राह चल रहा हूँ उस पर मेरी मंज़िल तो नहीं
कुछ भूख ने, कुछ ख़ौफ़ ने अलग राह चलने न दिया

हर सुबह मैं ऑफिस जाने की ढूंढता हूँ वजह
चाहता तो हूँ हसरतों ने मगर कभी रुकने न दिया


ज़िन्दगी का दायरा कैसे फैलता चला जाता है एक सर्किल का लगातार बढ़ता हुआ जैसे सरकमफेरेंस हो ! और इंसान मानो उस इमेजिनरी लाइन के ऊपर खड़ा...