Saturday, August 1, 2009

थोड़ा गालिबाना हो जाएँ ....

पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन था
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या ...

.... ग़ालिब के बारे में बहुत कुछ लिखा, पढ़ा और कहा गया है लेकिन मेरी पहचान इस अजीम शख्सियत से एक दूसरे उतने ही बड़ी शख्सियत ने कराई। मैं और मेरी जेनरेशन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसके लिए ताउम्र गुलज़ार साहब का कर्ज़दार रहेगा जिन्होंने अपने टीवी सीरियल के ज़रिये हमें गालिबियत से रूबरू कराया। ये सीरियल बेहतरीन था और ग़ालिब को maases के बीच लोकप्रिय करने में बहुत कामयाब रहा। ये बात दीगर होती है लोग जिस तेरह से गालिबाना अंदाज़-ऐ-बयाँ का इस्तेमाल करते हैं रोज़मर्रा की बोलचाल की भाषा में। मुझे लगता है की ग़ालिब के अलावा कबीर ही दूसरे कवि होंगे जो आवाम में इतने या इससे थोड़े अधिक मशहूर होंगे। मीर, जिनका लोहा ग़ालिब भी मानते थे, को लोकप्रिय करने के लिए फिर एक काबिल शख्सियत को आगे आना पड़ेगा। ऐसे कुछ और नाम होंगे।

ग़ालिब, गुलज़ार फरमाते हैं कि उनके लिए एक आम पड़ोसी के जैसा था जिसे आम का बेहद शौक़ था और जो शराब से अपने लगाव को कभी किसी से छुपाता नही था। दरअसल, अपनी मुफलिसी और मुश्किलों को ग़लत करने के लिए ग़ालिब ने शराब से दोस्ती बढ़ा ली थी। अपनी इस दोस्ती को ग़ालिब ऐसे बयाँ करते हैं -
ग़ालिब छुटी शराब, पर अब भी कभी-कभी
पीटा हूँ रोज़-ऐ-अब्र -ओ- शब्-ऐ-माहताब में

मैं आज भी याद करता हूँ ग़ालिब को इक बे-खौफ शायर के रूप में जिसने जिंदगी अपने तरीके से जी जब कि हालात और ज़माना दोनों लंबे अरसे तक उनके ख़िलाफ़ रहे।
हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है
वो हर एक बात पे कहना, कि यूँ होता तो क्या होता?

- मुक़र्रर! मुक़र्रर!

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