Saturday, August 8, 2009

न उतरा हूँ न उतरूंगा

मैं सूरज हूँ मैं चमकूंगा

तुम दूर बैठ कर देखोगे

सबकी जुबां पे चढ़ जाऊँगा

आवारा बादल का टुकड़ा हूँ

न जाने कहाँ, पर बरसूँगा

मस्त हवा का झोंका हूँ

खुशबु ले कर उड़ जाऊँगा

दूर हटो ऐ दुनिया वालों

आज सुनो, बस मैं बोलूँगा

याद करोगे देर तक तुम

चालें ऐसी कुछ चल जाऊंगा

गौर से देख लो मुझको

गया, फिर हाथ न आऊंगा

उन्मादी दरिया का पानी हूँ

हर बंध तोड़ बह जाऊँगा

जुनू है ऐसा जीवन का

मौत से भी लड़ जाऊँगा

3 comments:

AlbelaKhatri.com said...

waah waah
bahut khoob !

rohitler said...

Very beautiful...

डॉ .अनुराग said...

ये अंदाज भी खूब है ...बहुत अच्छे!

ज़िन्दगी का दायरा कैसे फैलता चला जाता है एक सर्किल का लगातार बढ़ता हुआ जैसे सरकमफेरेंस हो ! और इंसान मानो उस इमेजिनरी लाइन के ऊपर खड़ा...