Wednesday, August 12, 2009

त्रिवेणी

कल जो अपनी ज़ुल्फों को तुमने उठा के समेटा था
तेरी मांग का सिन्दूर मुझे दिख गया था
मेरे अरमानों के खून का रंग अभी भी था उसमे

4 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत खूब।

ravi ranjan said...

Kya baat hai....

"unko dekhenge to phir se tut jaayenge...na dekhnge to tauheen-e-mohabbat hogi...unko bhulenge to jeeyenge kaise...na bhulenge to naakam-e-zindagi hogi"

Sudeep Dwary said...

Thanks Ravi aane ki liye ...... kya baat hai .... tumhari baat pe yaad aaya hai kuchh .....

kuchh kaha jaaye na
chup raha jaaye na

unse mila jaaye na
tanha raha jaaye na

aise hi aate raho ... kahte raho ....

गौरव said...

बेहतरीन...........

ज़िन्दगी का दायरा कैसे फैलता चला जाता है एक सर्किल का लगातार बढ़ता हुआ जैसे सरकमफेरेंस हो ! और इंसान मानो उस इमेजिनरी लाइन के ऊपर खड़ा...