Sunday, August 16, 2009

होठों पे अपने तुमने दबा रखा क्या है
पलकों में मोती सा छुपा रखा क्या है

तमाशा देखने वालों घरों को जाओ
रात गुजर चुकी अब बचा क्या है

जले हैं घर जिनके पूछो उनसे जाकर
क्या बचा पाये हैं और जला क्या है

गाँव अपना छोड़ तुम शहर आ गए
बूढे माँ बाप वहां, यहाँ ऐसा क्या है

रातों को अक्सर टहलता है फलक में
कभी आधा कभी पूरा ये अजूबा क्या है

लब से कहा कुछ न आँखें पढने दी
उश्शाक बतलाएं हमें ये अदा क्या है

बाहर निकले तुम न हमें घर आने दिया
बात क्या है आख़िर तुम्हे हुआ क्या है

गरीब की छप्पर से धुंआ निकला है
देखो तो उसके घर जला क्या है

किस ख्वाहिश को इस बार मारा है
तेरी आंखों से फिर बह रहा क्या है

ढूंढ लूंगा एक दिन तुमको ऐ जिंदगी
मुसाफिर को चलने की सज़ा क्या है

1 comment:

Anjay said...

Wah! KYA baat hai

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