Saturday, August 22, 2009

निशाँ अब भी है बांकी ....

दिल के बंज़र ज़मीं पे
उन्होंने कभी मोहब्बत के बीज डाले थे
सींचा करते थे उसे अरमानों से
हरा भरा पौधा निकल आया था वहां रिश्ते का एक

वक्त के साए में बढ़ता रहा वह
बड़ा पेड़ हो गया था
विश्वास की मजबूत डालियाँ थीं उसकी
सपनों के पंछियों का बसेरा था उन पर

फिर एक दिन कहीं से तूफ़ान आया था
डालियाँ टूट गयीं थीं सारी
घोसले बिखर कर ज़मीं पे आ गिरे थे

ठूंठ पेड़ अभी भी खड़ा है वहीँ
यादों की जड़ें जो फ़ैल गयीं थीं
पूरी तरह ज़मीं के अन्दर
उन्ही मजबूत जड़ों ने उसे
संभाल रखा है .....

4 comments:

शोभा said...

ठूंठ पेड़ अभी भी खड़ा है वहीँ
यादों की जड़ें जो फ़ैल गयीं थीं
पूरी तरह ज़मीं के अन्दर
उन्ही मजबूत जड़ों ने उसे
संभाल रखा है .....
वाह! बहुत अच्छे।

Mithilesh dubey said...

लाजवाब रचना,। बधाई

manas said...

वाह! बहुत अच्छे।
Bas Gulzaar yaad aate hai inpe

Sehma sehma , dara sa rehta hai
Jane kyun Ji Bhra sa rehta hai

ek pal deikh loon to uthta hoon
Jal gaya sab , zara sa rehta hai

Regards
Manas

Anjay said...

Jab aage chalna hai to paon k nishan kyun dekhta musafir...

Tootker girte boondo me baadal kyun dhoondta musafir...

Aage roshini ka aagosh hai...aankhein moondo na musafir...

Kch pal jo bitaye to darakth k niche thak-ker...

Us pal me zindagi kyun dhoondta musafir.


Dada aapne bahut umda likha hai.

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