Tuesday, August 25, 2009

वो यार वो विसाल वो रात कहाँ से लाओगे

आरज़ू माना अपने हैं वो हालात कहाँ से लाओगे



दिल संग हो चुका अब दरिया-ऐ-चश्म बहता नहीं

अब बिछडे तो अश्कों की बरसात कहाँ से लाओगे



वो तेरा फिर कहना कि एक मुलाक़ात लाज़िमी है

हम मिल जाएँ पर करने को बात कहाँ से लाओगे



दरमियान अपने एतबार कहीं गुम हो चुका है अब

वो खामोशी वो सुखन वो ख़यालात कहाँ से लाओगे



ज़माना बदल जाओगे मुसाफिर किस ख्वाब में जीते हो

वो हौसले वो इरादे वो जज़्बात कहाँ से लाओगे

3 comments:

Mithilesh dubey said...

सुन्दर अभिव्यक्ती। लाजवाब रचना

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!

Anjay said...

Musafir fir uth k chala...matmaile kapde aur potli ko jhad fir se...Jo dhool giri dharti pe...uski khusboo juda si thi ab.

ज़िन्दगी का दायरा कैसे फैलता चला जाता है एक सर्किल का लगातार बढ़ता हुआ जैसे सरकमफेरेंस हो ! और इंसान मानो उस इमेजिनरी लाइन के ऊपर खड़ा...