Saturday, August 29, 2009

मैं तो बह रहा था
एक दरिया की तरह
तुम आए थे ठहराव बन कर
दोनों हाथों का किनारा देकर
तुमने पूरा समेट लिया था मुझे
पहली बार मुझे अपनी गहराई
का एहसास हुआ था तब

पर तुम तो जानते थे
रुकना मेरी फितरत थी नही
बह गया एक दिन फिर
उन मजबूत किनारों को तोड़कर
तुम पीछे छूटते गए
और मैं बहता गया

अब आलम ये है की
मंजिल का इल्म नही
और समंदर की चाहत नहीं
एक कश्ती लेकिन अब भी
बह रही है संग मेरे
वो तेरी यादों की है
शायद ही किनारा लग पाएगी अब

1 comment:

Anjay said...

Apni dhun to hum beh gaye...fitrat thi nahi rukne ki...

Lekin jisne bahon ka sahara dia...unki chahat zra dekho...

kinare se tootker beh gaye toote kinare banker...aur ek din hum me hi vilin ho jaynege...

kisko dosh doon...khud ko ya unki Mohabbat ko

Mere mehboob film ka title song yaad dila dia aapne...bahon ka sahara de de

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