Monday, August 3, 2009

मुसाफिर तू तन्हा कहाँ है!

एक रस्ता चलता है संग मेरे
एक दरिया गुनगुनाती है संग मेरे
कुछ यादें, कुछ बातें, कुछ नज्में मेरी
कोई खुशबु, कुछ ख्वाब, कई चेहरे
गज़लों की एक पुरानी किताब भी
एक पोटली ग़म की और दूसरी फटी हुई
चलते रहने की जरुरत का एहसास भी
एक ही रस्ते पर सब चलते हैं संग मेरे
मैं तन्हा कहाँ हूँ!

8 comments:

AlbelaKhatri.com said...

aapki kavita bal deti hai
urja deti hai..........
badhaai !

संजीव गौतम said...

प्रेरणादायी रचना

चंदन कुमार झा said...

बहुत खूब.....

चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

गुलमोहर का फूल

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Mitra,anand aa gaya aapki kavita key vachan sey,meri hardik shubh kamnayen,swagat aapka,
dr.bhoopendra

नीरज गोस्वामी said...

बहुत खूब कहा है...वाह...
नीरज

ravikumarswarnkar said...

बेहतर...आप तनहा कहां हैं?

शुभकामनाएं...

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

Anjay said...

Tokre zimmedariyon k har mod jud chale...
Aadi tirchi hatho ki lakeero k sahare kai mod mud chale.

Tanha chale the...zindagi k safar me...lekin,
Musafir k kadmo k nishano se kai karvaan jud chale...:-)

ज़िन्दगी का दायरा कैसे फैलता चला जाता है एक सर्किल का लगातार बढ़ता हुआ जैसे सरकमफेरेंस हो ! और इंसान मानो उस इमेजिनरी लाइन के ऊपर खड़ा...