Tuesday, August 11, 2009

वाह रे मीर, खुदा-ऐ-सुखन ....

बकौल गालिब .....
"कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था"

और ज़ौक फरमाते हैं .....
"न हुआ पर न हुआ मीर का अंदाज़ नसीब"

उसी मीर के बारे में एक video हाथ लगी है .... share कर रहा हूँ ......

2 comments:

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प !!!!

ओम आर्य said...

rochak post ...........shukriya

ज़िन्दगी का दायरा कैसे फैलता चला जाता है एक सर्किल का लगातार बढ़ता हुआ जैसे सरकमफेरेंस हो ! और इंसान मानो उस इमेजिनरी लाइन के ऊपर खड़ा...