Friday, August 6, 2010

बेरोज़गार

चल रहा हूँ .... एक जूनून सा है .... टकराता हूँ दीवारों से पर चलता जाता हूँ ....
तेज धूप है और ... पथरीले रास्ते हैं .... और सन्नाटा है ...
बवंडर है ... धूल उड़कर आँखों में आती है और छोटे छोटे पत्थर बदन में चुभते हैं ...
कपडे तर हो चुके हैं औए जूते घिस कर फटे हुए मुंह चिढाते हैं ...
फिर अचानक एक भीड़ में पाता हूँ खुद को ... सबकी हालत एक जैसी ...
लेकिन चल रहे हैं एक ही जानिब .... लगता है कुछ मिलने वाला है ...
लेकिन डर है ... कि कोई और छीन न ले उसके हाथों में आने से पहले ......

फिर सब थम सा जाता है .....

दोस्त की आवाज़ सुनता हूँ ..... आँखें खुली तो एहसास हुआ दोपहर का वक़्त है ...
मैं उठता हूँ ... कपडे ठीक कर अपनी फाइल उठाता हूँ ....
और  इंटरव्यू के लिए चल देता हूँ ...
वही मंज़र उभरने लगते हैं फिर .....
पता नहीं मैं पहले ख्वाब में था या किसी  इंटरव्यू की लाइन में !






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