Wednesday, July 30, 2014

गर्मी की छुट्टियाँ थीं
आदतन मैं गाँव में था
बाँकी सब तो ठीक था
पर आँगन की उदासी
बड़ी खल रही थी

मुझे वहां पसरे हुए
सूनेपन का एहसास हो रहा था
वो शायद इसलिए दुखी था
कि  उसके सर से बूढ़े पेड़ का
साया उठ गया था

मुझे याद कि कितनी चहल पहल
रहती थी आँगन में दिन भर
बच्चों ने झूला बनाकर रखा था
पेड़ की टहनियों पर
घंटो झूलने के बाद जब आँगन में
कूदते थे तो लगता था कि
ख़्वाबों की फ्लाइट लैंड हुई हो

बूढ़े पेड़ ने कभी उस पर अपने
बड़े होने का एहसास नहीं दिलाया था
उसे पता था कि खड़ा है वो इसलिए कि
उसकी जड़ें ज़मीन से जुडी हुई हैं
पर गाँव में एक नया मंदिर बना था
उसकी लकड़ियाँ वहीँ काम आई हैं
बेरहमी से लोगों ने काटा था
उसकी मजबूत और पुरानी जड़ों को

आँगन की बातों से मुझे लगा
मैं भी तो शहर जाकर काट रहा हूँ
गांव से जुडी मेरी जड़ों को
मैं जाने किस मंदिर के काम आऊंगा!
 

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