Thursday, August 21, 2014

बचपन से ही मैंने
कुछ आँखों में झाँक कर
उनके सपनों को देखा है
उनके संग जिया हूँ मैं
उनको महसूस किया है मैंने
संग चला हूँ मैं
कभी उनकी लाठी बनकर
उड़ान भरी है मैंने
कभी उनके पंख बनकर

देखा है मैंने अपनी आँखों से
कि कुछ सपने पानी के
बुलबुलों की तरह उठते और
फिर जैसे यथार्थ की
उँगलियों से टकरा कर
गिर कर टूट जाते
और बह जाते
उन आँखों से आँसू बनकर

पर कुछ सपने जिद्दी होते
उड़ते रहते गुरुत्वहीन बनकर
फिर एक दिन अचानक
बड़ी सहजता से उतर जाते
यथार्थ की धरातल पर
उन आँखों में
एक बड़ी चमक पैदा कर

अब उन आँखों को देखने
तरसती हैं मेरी आँखें
पर जब भी यदा कदा
झांकता  हूँ उनमे
देखता हूँ कुछ उदास सपने
कुछ लड़खड़ाते और
कुछ दम  तोड़ते सपने
लेकिन फिर भी
पाता हूँ वहाँ
बहुत सारी
खामोश उम्मीदें  …
 

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