Friday, August 29, 2014

दिन तुम रख लो
रातें मैं रख लेता हूँ
ख़ामोशियाँ तुम चुन लो
बातें मैं रख लेता हूँ
अपने गीत दे दो मुझे
और मेरी नज़में ले जाओ
चाँद का तसव्वुर रख लूँ मैं
एहसास चांदनी का तुम ले जाओ

जब इस मोड़ से बँट रहीं हैं राहें आज
बाँकी सब भी आधा-आधा बाँट लेते हैं
बस उन लम्हों को छोड़ देना यहीं
उन्हें आज के बाद भी मुकम्मल ही रहने देना

पर वो लम्हे मुकम्मल थे तभी
जब इनमे मैं और तुम दोनों शुमार थे
हमेशा बिना किसी शर्त के
बस उन लम्हों की यादों को
थोड़ा तुम ले जाओ थोड़ा मैं
आज के बाद मैं और तुम साथ
इन यादों में ही रहेंगे

मुझे जब तुमसे बातें करनी होगी
या तेरी उंगलियां छूना चाहूँ कभी
यादों के इसी मोड़ पर वापस आऊंगा चल कर
और उन्ही लम्हों में उतर जाऊँगा मैं
उनमे तुम मिलोगी मुझे वैसे ही
जैसे अब तक मिलती रही थी

तुम्हारा भी जब दिल करे
मेरे कानों में कुछ कहने का
या मेरे कंधे पे सर रख कर सो जाने का
तुम भी आ जाना यहीं
तुम मुझे यहाँ वैसे ही पाओगी
तेरी बाहों को थाम कर
इन्ही राहों में तेरे संग चलते हुए
 

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