Saturday, August 9, 2014

आसमां में जब मैं बादल देखूँ 
तेरे लब पे काँपता एक हलचल देखूं 
 
तेरी आँखों के गीले आईने में 
मैं अपनी पेशानी के बल देखूँ 
 
अब तक तो हँस कर निभा ली हमने 
इस रिश्ते का क्या होगा कल देखूं 
 
दूर से बस ज़ुबाँ की सुन पाता हूँ 
क्या  उनकी ख़ामोशी कहे वहीँ चल देखूं 
 
मुसाफ़िर को ज़माना समझे सुख़नवर 
मैं आईने में दीवाना एक पागल देखूं 
 

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