Saturday, November 15, 2014

मैं जानता हूँ
तुमने ऊचाईयां
हासिल कर ली हैं
एवेरेस्ट हो गए हो
ख़ुश्क और ठन्डे

कभी-कभी तो
उतरो अपने आसमान से
आओ तो जरा  मैदानों में
पिघल जाओ और बहने लगो
फिर ज़िन्दगी की धार बनकर 

No comments:

ज़िन्दगी का दायरा कैसे फैलता चला जाता है एक सर्किल का लगातार बढ़ता हुआ जैसे सरकमफेरेंस हो ! और इंसान मानो उस इमेजिनरी लाइन के ऊपर खड़ा...