Saturday, December 20, 2014

एक नए सफ़र पर चल पड़े हो तुम
पर ये सफ़र है या तेरी कोई जुस्तजु ?
तुम्हे है तलब एक ऐसे शै की
जी तेरी प्यास को बुझा दे
महसूस कर रहे हो शायद तुम
कि मुकम्मल नहीं हो तुम
कही है तेरे अंदर कुछ ऐसा
जो उतर  आया है बगावत पर
जंग छेड़ दी है उसने आज
चाहिए उसे आज़ादी
तेरे बाकी के वजूद से
उसने तुमसे कर दिए हैं कई सवाल
जिनके जवाबों की खातिर
तुम चल पड़े हो इस सफर पर

घूम रहे हो तुम शहर-दर-शहर
देखे तुमने नए लोग, नए मंजर
देखे तुमने अपनी माजी के हिस्से
सुने बच्चों और बुजुर्गों के किस्से
अनजान गलियों में जो चले तुम
कई चेहरों के तबस्सुम बने तुम
नए तजुर्बे, नए एहसासात मिले
सवालों के शायद जवाबात मिले

अब ये सफर खत्म होने को है
तुम फिर होगे वहीँ जहाँ से थे चले
पर वो जो शख़्स चला था वो न होगा
तुम्हारी शख़्सियत होगी अलहदा
तेरा नजरिया बिलकुल जुदा

शायद इस सफर में
जिसकी इब्तदा भी थी और इन्तहा भी
तुमने आगाज़ किया एक और सफर का
ये वो सफर है जिसमे
मुसाफ़िर को मंज़िल का इल्म नहीं
न राह मालूम न फासला
पर ये वो सफर है
जो तुम्हे खुद तय करनी है
खुद में तय करनी है
जिसमे मुसाफ़िर खुद
और मंज़िल भी खुद

ये भी एक जुस्तजू है
पर इसके मुकम्मल होते ही
बाकी सारे खोज खत्म हो जाएंगे
रहेगी फिर न कोई आरज़ू बाकी
न कोई तलब न कोई ख्वाहिश
फिर न रह जायेगी
किसी सवाल की कोई अहमियत
इल्म का सूरज ऐसे निकलेगा कि
उसकी रौशनी में
खिल उठेगी तेरी शख़्सियत

वैसे जिंदगी भी तो
एक मुसलसल सफ़र ही तो है
जिसकी न इब्तदा मालुम
और न इन्तहा




 

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