Thursday, May 21, 2015

कोई जैसे डायरी के
ज़र्द पुराने पन्नों को
फाड़कर निकालता है
और डस्ट-बिन में डाल देता है
वैसे ही हमारे रिश्ते को
तुमने छोटे-छोटे पुर्जों में
फाड़कर फेंका था उस दिन

मैं आज भी
उन टुकड़ों को ढूंढता हूँ
उस मोड़ पर जाकर

सुना है पर वक़्त ने 
तेज आँधियाँ चलायी थीं
उस रोज
उसी में उड़ गए हों शायद

या फिर हर शाम को
जो बारिश होती है
और सारी रात ठहरती है
उसमे बह गए होंगे

कुछ रिश्तों के निशाँ भी
कितनी आसानी से
मिट जाते हैं ना

पर तुम्हारी यादों ने
जो दास्ताँ दिल के
कागज पर लिखी है
वो शायद कभी न मिट पाये

किस परमानेंट इंक से
लिख गयी हो अपना नाम !


 

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