Tuesday, May 19, 2015

खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
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टुकड़ा हस्ती का टूटकर गिर गया कहीं
आरज़ू बस हर पल एक पास रखता हूँ
मेरा था तो मिल ही जाएगा एक दिन ...
कैसे कहूँ मैं कि ये विश्वास रखता हूँ
बैठ जाऊं फिर तो लम्बा कहीं विश्राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए


मैं हूँ वो नदी जो समंदर जानती नहीं
परिंदा वो जो अपनी परवाज़ ढूंढता है
हूँ वो रस्ता जिसपे कोई मंजिल नहीं
एक साज़ ऐसा जो आवाज़ ढूंढता है
इस जुस्तजू में सारी उम्र कहीं तमाम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए

चाहता हूँ हिम या बहती जलधारा
दरिया की मौजें या उसका किनारा
सही राह अक्सर पहचान नहीं पाता
जान नहीं पाता अंतर्मन का इशारा
इसी ग़फ़लती में गलत कोई अंजाम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए

रौशन दिवस को तम में ढलना होता है
कोयला है चट्टान मगर जलना होता है
जीवन में कई बार ऐसे हालात आते हैं
मन के विरुद्ध खुद को चलना होता है
लड़ रहा हूँ इस युद्ध में हार मेरे राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए

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